हमारा देश प्राचीन काल से ही ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी रहा। विभिन्न प्रतिकूलताओं ने शिक्षा के क्षेत्र को भी प्रदूशित किया। विभिन्न परिवर्तन किये परिणाम स्वरूप यवा पीढ़ी की सोच एवं कार्यशैली में भी परिवर्तन हुआ । देश को हम क्या दे सकते है की सोच के स्थान पर देश हमें क्या देता है? समाज हमें क्या देता है का भाव पैदा होने लगा। वैज्ञानिक , चिकित्सक , अभियन्ता चन्द डालरों की लालच में भारतभूमि को छोड़कर विदेश जाने को लालायित होने लगे। स्वतंत्रता के बाद में भी देश की शिक्षा व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। अंग्रेजों की शिक्षा पद्धति को ही भारतीय शिक्षा का नाम दिया गया, यहाॅ तक महात्मा गाॅधी की बुनियादी शिक्षा प्रणाली को भुला दिया गया। भारतीय जीवन मूल्यों , परम्पराओं ,संस्कृति को त्याग दिया गया। शिक्षा के नाम पर साक्षरता मात्र बढ़ी, संस्कार विलुप्त होने लगे, शिक्षा बढ़ने के साथ भ्रश्टाचार अनैतिकता,संवेदनशून्यता बढ़ने लगी। देश का जागरूक वर्ग चिन्तित हुआ ।
